Monday, 20 April 2015

बीते पलों की जब याद हमे आती है ,

दिल को तड़पाती है दिल को रुलाती है ,

वो दिन लौट के फिर ना कभी आते हैं ,

गुजरे पलों की हमे जब दास्तान बताते हैं ,

जिंदगी मे ऐसी भी घड़ी आती है ,

मेरी यादे तेरी यादे ,तेरी यादे  मेरी यादे ,

तेरी यादे , मेरी यादे यादे यादे यादे यादे ,

वक़्त गुजरता पल बीआईटी जाता है ,

रोते दिलों को एक पल मे हँसाता है ,

यादे हमारी हर पल जिंदा रहती हैं ,

हम भूल नहीं पाएंगे यादे ये हरदम कहती हैं ,

यादें जीवन की एक अजब कहानी है ,

कहीं पे खुशियाँ तो कहीं पे गम की ज़िंदगानी हैं ,

यादे हमे जो एक अहसास दिलाती हैं ,

इसके भरोसे सारी प्यास बुझ जाती है ,

यादें ही जीवन का जो खेल सिखाती हैं ,

जीवन की बातों का आईना दिखती हैं ,

याद तेरी आती याद तेरी आती है ,

तेरी तस्वीर हमे याद बाँके आती है ..... 


अगर तुम चाहो तो जहां सारा ,

थाम लो दुनिया का सारा नजारा ,

लहरों से सीख करना इशारा ,

उमंग हो तो दिल मे जग तुम्हारा ,

रंग की मर्जी से हारा जग सारा ,

दुनिया का खेल अजब निराला ,

नील गगन मे है चंद का उजाला ,

चाँदनी को भी तारों का सहारा ,

भोर की किरणों ने हमको जगाया ,

जीवन का खेल हमको बताया ,

कहीं पर खुशियों का मेला लगाया ,

कहीं पर गम का मातम है छाया ,

हो कलियाँ खिली भोर गुनगुनाया ,

फूलों ने हमको हसना सिखाया ,

जलते दिये मे उजाला समाया ,

खुद अंधेरों मे रहकर जीना सिखाया .... 

Saturday, 14 February 2015



मेरा भारत महान ! कितना गर्व महसूस होता है न कहने में . लेकिन इस महानता के अन्दर बहुत सी सिसकियाँ भरी है जो हमें कचोटती है . एक ऐसी ही समस्या है दहेज़ . ‘’बाबुल की दुवाएं लेती जा , जा तुझको सुखी संसार मिले’’ इस गाने में बाप, बेटी को दुवाएं देता है , लेकिन अब सिर्फ दुवावों से काम नहीं चलता .बेटी की ख़ुशी तो अब दहेज़ पर निर्भर करने लगी है .दहेज प्रथा इस देश की सबसे बड़ी सामजिक बुराई है जिसने कई बेटियों की जीवन लीला समाप्त कर दी है .वैसे दहेज़ प्रथा के खिलाफ अनेक आन्दोलन हुए हैं लेकिन इसका कोई सार्थक निष्कर्ष नहीं निकल पाया है .दहेज़ प्रथा ने ही कन्या भ्रूण ह्त्या जैसी सामाजिक बुराई को भी बढ़ावा दिया है .
      किसी ने क्या खूब दहेज़ पर तंज कसते हुए कहा है कि ‘बेटी का घर बसाने के लिए ,बाप अपना घर बेच देता है ‘.  बिडंबना ये है की दहेज़ का विरोध भी लोग तब तक करते हैं जब तक ये काम कोई दूसरा कर रहा होता है . अपने घर में जब भी ये स्तिथि आती है तो लोग मौन साध लेते हैं . ये भी तो एक सामाजिक बुराई है जिस पर कोई नहीं बोलता . वैसे तो बेटियों को हम लक्ष्मी मानते हैं लेकिन कागज़ की लक्ष्मी के लिए उसका शोषण भी करते हैं . दहेज़ की मार से अपनी बेटी गंवा चुके एक बाप के दर्द को भोजपुरी गायक गोपाल राय ने क्या खूब गाया है ‘ जनती जे लागी हतियारी ए बेटी ,रखती तोहके कुंवार ,भले ज़माना देयीत गारी ऐ बेटी, रखती तोहके कुंवार ‘. अर्थात बाप बेटी को संबोधित करते हुए कहता है कि बेटी अगर मुझे पता होता की तुम्हारी ह्त्या हो जायेगी तो तुम्हे कुंवारी ही रखते , भले ये ये समाज मुझे गाली देता लेकिन हम तुमको कुंवारी ही रखते .
      भारत में दहेज़ प्रथा की समस्या दिन प्रतिदिन बढती ही जा रही है जिसमे बुद्धिजीवी लोग भी अप्रत्यक्ष रूप से शामिल हैं .और सबसे  बड़ी बिडम्बना तो ये है कि जहां इस पितृसत्तात्मक समाज में महिलाओं की स्तिथि बुरी बनी हुई है जिसकी बराबर की जिम्मेदार भी वे खुद ही हैं जिसमे की पुरुष तो साधन मात्र हैं . क्योंकि घर में दहेज़ की डिमांड भी लड़के की माँ औए बहन ही ज्यादा करती हैं .
      दहेज़ के लिए लोगों के अन्दर कितनी लालच होती है इसका कोई अंदाजा भी नहीं लगा सकता. इसके खातिर इंसान अपनी मानवीय संवेदना को भी भूल जाता है . कोई ये नहीं सोचता की उस बाप के ऊपर क्या बिताती होगी जो अपनी जिंदगी की गाढ़ी कमाई अपनी  बेटी की शादी में खर्च कर देता है लेकिन बेटी की ससुराल वालों की डिमांड तब भी पूरी नहीं होती,और बेटी की ख़ुशी की खातिर कुछ बोल भी नहीं पाता है . दहेज़ की समस्या के लिए रुढिवादिता सोच भी जिम्मेदार है .

      इस समस्या की जितनी भी बुराई की जाए उतनी ही कम है . दहेज़ मानवता के नाम पर कलंक है जिसको आज तक धोया नहीं जा सका है . इस समस्या को अगर हटाना है तो हमें खुद आगे आना होगा . समाज को बदलने से पहले हमें खुद बदलना होगा . ‘’जब हम सुधरेंगे ,तब जग सुधरेगा ‘’ के सिद्धांत पर अमल करना ही होगा . ‘’बेटी ही दहेज़ है ‘’ के सिद्धांत को समाज पर लागू करने की जरुरत है .